ख़ुशी की तलाश - मात्र एक भ्रम
हमें जिंदगी की किसी न किसी मोड़ पर ऐसा जरूर प्रतीत होता है की हमें कुछ अच्छे की जरूरत है। कुछ बढ़िया मिल जाए तो मजा सा आ जाये, कामना यही उठती है की यहां नहीं तो कहीं और जरूर ख़ुशी मिलेगी। पर जब हम अनेको प्रयासों के बाद वहाँ पहुँच जातें है तो फिर अंदर से लगने लगता है की कोई न कोई कमी जरूर रह गई है। पर हमें अब ज़रा सतर्क रहना होगा। जी हाँ सतर्क और सावधान।
आप सोचते हैं की शान्ति पाने के लिए आपको अपने सपने पूरे करने जरूरी है। जी बहुत बढ़िया बात पर आप यह नहीं जानते की बचपन से लेकर आज तक आपके या हम सभी के साथ यही तो होता है है की सुख चैन कहीं मिला ही नहीं। जाने की कोशिश नहीं करी क्यों ?
पहली कक्षा में थे तो लगता था पांचवी में मजा आएगा और सब सही हो जायेगा, पांचवी में गए तो लगा की आठवीं में धौंस बनेगी, उसके बाद बारहवीं, कॉलेज, नौकरी या उद्योग, पर मन ख़ुशी ही ढूंढ रहा है क्यूंकि उसने यह समझा है की ख़ुशी शान्ति है। इसलिए दोबारा समझिये आपको अब सतर्क और सावधान रहना होगा।
थोड़ा और गहराई में उतारते है और समझते है- देखिये मन को हमेशा खुश होना है। इसलिए वह विचार करता है की ये वाला काम नहीं दूसरा काम अच्छा है। ध्यान रहे अभी मन की स्थिति ख़ुशी पाने से पहले की है। अब मान लीजिये की वह काम आपने पूरा कर लिया जो चाहा वह हासिल कर लिया अब उस ही मन की स्थिति यह है की काम पूरा होने के बाद भी असंतुष्ट है और भटक रहा है। दोनों ही स्थिति तो मन की ही है ना।
इसलिए जो सफल व्यक्ति हैं वह असफल, ना खुश और चिंतित है।
अब आपको करना क्या है कैसे इससे बचें ? सरल सी बात है जब भी आपको यह विचार उठने लगे की ख़ुशी कहीं और है तब एक सिपाही की तरह जैसे वह दुश्मन के आगे डट कर खड़ा हो जाता है वैसे ही आप अपने इस विचार के आगे खड़े हो जाएं।
आपको ऐसा किसलिए करना चाहिए ?
ऐसा इसलिए कीजिये क्यूंकि अगर आप बार बार मन की ख़ुशी या मन की शान्ति के पीछे भागेंगे तो अपने आपको असफल पाएंगे। अब आप ख़ुशी की और न जाकर धर्म की और जाएँ मतलब एक ऐसा कार्य जो ऊँचे दर्जे का हो। जिसको करके आत्मा की तृप्ति हो न की आपके मन को ख़ुशी मिले।
धर्म का अर्थ - माने वह जो बिलकुल साफ़ है, जो सही है , जिसको करके आपका न ही फायदा हो ना ही नुक्सान पर उसका पूरा होना अति आवश्यक हो। धर्म का काम आपमें लालच नहीं बढ़ाता, प्रेरणा नहीं देता ना ही किसी प्रकार की सीख पर इसका इस समस्त जीवों के बीच हों अनिवार्य है। ऐसा मैं नहीं बल्कि सारे ग्रन्थ कहते हैं।
मजा आने वाला काम मत कीजिये क्यूंकि वह सुख भोगने मात्र है। भोगी हुई चीज बार बार ख़तम होती है पनपती है। और आप उलझे रहते हैं।
यह भी याद रखिये की आप जब तक जीवित है मन से बंधे रहेंगे और बार बार यह इच्छा आएगी की कुछ मजेदार करते है। पर आपको देखना होगा की आपका धर्म क्या है। धर्म का तात्पर्य सही काम से है न की हिन्दू , मुस्लिम और सिख या अन्य कोई सांसारिक धर्म से।
जब आप पाएंगे अपने आपको किसी धर्म के कार्य में तब आप ख़ुशी की चिंता हे नहीं करेंगे और धर्म के रास्ते में चलते हुए ख़ुशी मिल गई तो भी आपको उसकी परवाह नहीं होगी।
धन्यवाद।

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